Kya tujhko tarkeeb sikhaaoon

मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे

अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते

जब कोई तागा टूट गया या ख़तम हुआ

फिर से बांधके और सिरा कोई जोड़ के उसमें

आगे बुनने लगते हो

तेरे इस ताने में लेकिन, इक भी गाँठ गिरह बुन्तर की

देख नहीं सकता है कोई

मैंने तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता

लेकिन उसकी साड़ी गिरहें साफ़ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे

I have had the audacity to write back to such lovely words from none other than Gulzar Saheb

क्या तुझको तरकीब सिखाऊँ, क्या कह दूं मैं

ताने बाने बुनते बुनते मैंने सीखा

छोटी छोटी गांठें जब जब बांधीं मैंने

उनको अनगिन तानों तले दबाया मैंने

छोटी सी वो गाँठ तो यूँ ही छिप जाती है

सुन्दर तानों बानों के बीच कहीं पर

जब तक तुम न ढूंढो उन गाठों को मन से

बिना गाँठ का दामन ही आएगा सामने

वो कहते हैं न, जो ढूंढोगे वो पाओगे

ये तो बस अपनी अपनी इच्छाओं पर है

गाँठ अगर ढूंढोगे तो फिर गाँठ मिलेगी

कितने ही तानों बानों से उसको ढक लो चाहे

दामन आये हाथ में तो गांठों को छोड़ो

केवल ताने बाने नहीं मिला करते हैं

रेशम की डोरी में गाठें भी, ताने भी

ये तो अपनी नज़र नज़र की बात है यारों

एक गाँठ गर आ जाए रिश्ते में तो क्या

उसके ऊपर बुन दो कई ताने बाने तुम

बस इतना करना की पलट पलट के

उन गांठों को ढूँढने की कोशिश न करना

क्या तुझको तरकीब सिखाऊँ, क्या बोलूँ मैं

ताने बाने बुनते बुनते मैंने सीखा……………………

(Thanks to Sandeep who sent me the prose from Gulzar saheb and planted the idea in my head to write back)

3 Comments

  1. Sandeep said,

    June 16, 2009 at 4:36 pm

    bahut khoob

  2. Pritesh said,

    June 16, 2009 at 4:45 pm

    Shukriya Sandeep………..:-)

  3. altered ego said,

    June 24, 2009 at 6:49 pm

    ah gulzar..isn’t he wonderful. where you there when he came to iisc? in case you weren’t there is a sneak peek into tht evening here :
    http://alter-ed-egos.blogspot.com/2008/09/gulzariisc.html

    :)


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